शुभचिंतकों से
मृत्यु के बाद कोई आस नहीं रहेगी अमरता और पुनर्जन्म में मेरा यक़ीन नहीं अन्तिम वक़्त जब हो, तब पुरानी डायरी में पड़े सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की गंध को आख़िरी सांस में भर लेना चाहता हूं सुकून के साथ मेरी मौत का इश्तहार भी छपवाना शोक संदेश मेरी अन्तिम सांस का ज़िक्र भी करना एक अख़बार उस तक भी पहुंचे। - पंकज झा