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Showing posts from May, 2020

शुभचिंतकों से

मृत्यु के बाद  कोई आस नहीं रहेगी अमरता और पुनर्जन्म में मेरा यक़ीन नहीं अन्तिम वक़्त जब हो, तब   पुरानी डायरी में पड़े  सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की गंध को  आख़िरी सांस में भर लेना चाहता हूं सुकून के साथ मेरी मौत का इश्तहार भी छपवाना शोक संदेश मेरी अन्तिम सांस का ज़िक्र भी करना  एक अख़बार उस तक भी पहुंचे। - पंकज झा

जन्म सौ - सौ बार हो

अश्रु नेत्रों से बहे यों, ज्यों रुधिर की धार हो यंत्रवत बेकल हृदयतल, छूटता संसार हो गीत मैं कैसे रचूँ ? कैसे सृजन का बीज बोऊँ ? शब्द - स्वर जब हैं व्यथित, तब स्वार्थी कैसे मैं होऊँ बाण से बींधा हुआ मैं अंत स्वर को ताकता सूक्ष्म जब परलोक तल पर स्थूल क्यूं पथ जोहता मैं निमंत्रण दे न पाया किन्तु आना था तुम्हें निज हृदय, संताप, पीड़ा हर के जाना था तुम्हें इंद्रधनुषी व्योम से  सागर ही बरसा है प्रिये ! हा! तुम्हारे बिन, तुम्हारा प्रेम तरसा है प्रिये ! भाग्य उदय की आस में, निज उर की है ये कामना मोक्ष पाने को, हमारा जन्म सौ - सौ बार हो - पंकज झा

तैयार हो जाओ मुसाफ़िर

थी निशा घनघोर, अब तैयार हो जाओ मुसाफिर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! ब्रह्म वेला में खरज की तान साधक है लगाता रात्रि के अवसाद तज वो, गीत नूतन है सुनाता मल के दृग, संताप तज तुम ज्वार हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! कोकिलों का गान सुन, कुछ प्रेरणा उर में भरो नींद त्यागो, नीड़ छोड़ो,  कर्म पथ पर पग धरो रात्रि भर तुम सुप्त हो, अब पुष्प हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! यह भी संभव है सुबह, माहौल कुछ प्रतिकूल हो प्रस्तरों से पथ भरा हो, पग के नीचे शूल हो होंगे सब निष्फल, प्रबल हुंकार हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! - पंकज झा

बेटा

तुम महज़ डेढ़ बरस के ही तो हो लेकिन आँखें तुम्हारी दिखाती है मुझे सारी दुनिया पढता हूँ सारा संसार, हर इक शय जो एक पल को नज़रें मिल जाएं ,तो ज़र्रा-ज़र्रा संसार का स्फटिक सा दिखता है साफ़  तुम्हारे काले-लम्बे चारों ओर तीर से फ़ैले बाल  मुझे काले नहीं, सुनहरे नज़र आते हैं जैसे तुम सूर्य हो और अपनी किरणें फ़ैला रहे हो  समूचे ब्रह्मांड में जब जब बोलते हो अपनी गडमड बोली में  "पप्पा" ऐसा लगता है जैसे किसी ने बाँचा हो महाकाव्य, हर बार, तुम्हारे शरीर की गन्ध  हज़ारों टन गुलाब के इत्र पर भारी है बेटा! मैं जानता हूँ  ऊपर की सारी बातें, सारी उपमाएं  सिर्फ़ मुझी को सच लगती है  क्योंकि मैं पिता हूँ तुम्हारा  सो स्वार्थी हूँ  तुम्हें ईश्वर तुल्य कर रहा हूँ  जो तुम हो नहीं  वैसे मैं चाहता हूँ  कि तुम्हारी आँखो में दुनिया दिक्खे मुझे ही नहीं, पूरी दुनिया को मैं चाहता हूँ- तुम वो सूर्य बनो जिसके किरणें, विनम्रता से ब्रह्मांड की सीमाएं पार कर जाएं मैं चाहता हूँ - 'आह' तक में तुम्हारी  एक महाकाव्य छिपा हो, कि तुम्हारी गन्ध हज़ारों टन गुलाब के इत्र...

हालात

सत्ता के गलियारे खुश हैं नफ़रत के हरकारे खुश हैं आग चारसू लगी हुई है ये भी खुश हैं, वो भी खुश हैं औंधा पड़ा हुआ तड़पता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको कैसा लगता है? पहरेदार अब हुए लुटेरे मूढ़मति है सबको घेरे बच्चों को अपने लतियाते काले निकले सबके चेहरे संगीनों के तले बिलखता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको  कैसा लगता है? भूख, नौकरी, किसे पड़ी है? टूट वतन की रही लड़ी है बेढंगे, बकवास, बेवजह कानूनों की लगी झड़ी है मिमियाता, बेज़ार, कलपता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको कैसा लगता है? - पंकज झा

आधी रात में

आधी रात में अचानक आती हुई पुलिसिया सायरन की आवाज़  कितनी बेसुरी है, कितना मार्मिक है सुन लिए जाने के खौफ़ में लिपटी घुटी हुई सिसकियों को सुन लेना  कितने डरावने हैं  चारों तरफ अट्टहास करते हुए चेहरे जो सिसकियों में ढूंढ़ते है आत्मिक संतोष जिनके लिए पुलिसिया सायरन शास्त्रीय संगीत है - पंकज झा

अभिलेख

उन सुर्ख़ दीवारों पर कभी नाम लिखा था मैंने तुम्हारा, टेढे़-मेढे़,आरे-तिरछे,उल्टे सीधे दर्ज़ किए थे कई प्रसंग तुमसे ही जुड़े हुए देवनागरी में नहीं लिखा था वो गुप्त लिपि मेरी थी स्वरचित एक ऐसा अभिलेख जो तुम्हारे साथ ही चिन गया दीवारों में इतिहासकारों के हाथ तक नहीं आया कुछ बेचारे..!! आज खुरचने बैठा हूँ वो सुर्ख़ दीवारें ----पंकज झा

बीस साल बाद की कविता

कैसी हो?  ठीक ही होगी ऐसा ही दावा रहता था न तुम्हारा  हमेशा! ख़ैर ! अब भी पढ़ती हो क्या ? किताबें? अब भी वैसी ही है क्या दिनचर्या तुम्हारी एक - एक सेकेंड फिक्स,  व्यस्तता कुछ कम हुई या नहीं? क्या अब भी कृष्ण केश तुम्हारे चेहरे का आवरण बनते हैं या फिर चांदनी फूटने लगी है उनसे  और तुम्हारी अधरों पर फैली वो मुस्कुराहटें ? उनका क्या? धान की बालियों - सी ही अल्हड होंगी अब तलक जीवन में खुश कैसे रहें  इसके पर्याप्त सूत्र थे तुम्हारे पास तुमने अब तक संभाल कर रखे हैं क्या ? जानती हो  इतने दिनों में , मैं बहुत कुछ बदल गया हूं बूढ़ा हो गया हूं झुर्रियां साफ दिखाई देती हैं शुष्क दरारों से इनकी  नदियां बहा करती हैं लेकिन कुछ है, जो नहीं बदला  इन बीस सालों में  यही कि मुहाने इन नदियों के आजतलक तुम्हारी ही जानिब देखते हैं ।