बीस साल बाद की कविता
कैसी हो?
ठीक ही होगी
ऐसा ही दावा रहता था न तुम्हारा
हमेशा!
ख़ैर !
अब भी पढ़ती हो क्या ?
किताबें?
अब भी वैसी ही है क्या दिनचर्या तुम्हारी
एक - एक सेकेंड फिक्स,
व्यस्तता कुछ कम हुई या नहीं?
क्या अब भी कृष्ण केश तुम्हारे
चेहरे का आवरण बनते हैं
या फिर चांदनी फूटने लगी है उनसे
और तुम्हारी अधरों पर फैली वो मुस्कुराहटें ?
उनका क्या?
धान की बालियों - सी ही अल्हड होंगी अब तलक
जीवन में खुश कैसे रहें
इसके पर्याप्त सूत्र थे तुम्हारे पास
तुमने अब तक संभाल कर रखे हैं क्या ?
जानती हो
इतने दिनों में , मैं
बहुत कुछ बदल गया हूं
बूढ़ा हो गया हूं
झुर्रियां साफ दिखाई देती हैं
शुष्क दरारों से इनकी
नदियां बहा करती हैं
लेकिन कुछ है, जो नहीं बदला
इन बीस सालों में
यही कि मुहाने इन नदियों के
आजतलक तुम्हारी ही जानिब देखते हैं ।
Comments
Post a Comment