हालात
सत्ता के गलियारे खुश हैं
नफ़रत के हरकारे खुश हैं
आग चारसू लगी हुई है
ये भी खुश हैं, वो भी खुश हैं
औंधा पड़ा हुआ तड़पता अपना हिंदुस्तान
कैसा लगता है, तुमको
कैसा लगता है?
पहरेदार अब हुए लुटेरे
मूढ़मति है सबको घेरे
बच्चों को अपने लतियाते
काले निकले सबके चेहरे
संगीनों के तले बिलखता अपना हिंदुस्तान
कैसा लगता है, तुमको
कैसा लगता है?
भूख, नौकरी, किसे पड़ी है?
टूट वतन की रही लड़ी है
बेढंगे, बकवास, बेवजह
कानूनों की लगी झड़ी है
मिमियाता, बेज़ार, कलपता अपना हिंदुस्तान
कैसा लगता है, तुमको
कैसा लगता है?
- पंकज झा
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