अभिलेख
उन सुर्ख़ दीवारों पर कभी
नाम लिखा था मैंने तुम्हारा,
टेढे़-मेढे़,आरे-तिरछे,उल्टे सीधे
दर्ज़ किए थे कई प्रसंग
तुमसे ही जुड़े हुए
देवनागरी में नहीं लिखा था
वो गुप्त लिपि मेरी थी
स्वरचित
एक ऐसा अभिलेख
जो तुम्हारे साथ ही चिन गया
दीवारों में
इतिहासकारों के हाथ तक नहीं आया कुछ
बेचारे..!!
आज खुरचने बैठा हूँ
वो सुर्ख़ दीवारें
----पंकज झा
नाम लिखा था मैंने तुम्हारा,
टेढे़-मेढे़,आरे-तिरछे,उल्टे सीधे
दर्ज़ किए थे कई प्रसंग
तुमसे ही जुड़े हुए
देवनागरी में नहीं लिखा था
वो गुप्त लिपि मेरी थी
स्वरचित
एक ऐसा अभिलेख
जो तुम्हारे साथ ही चिन गया
दीवारों में
इतिहासकारों के हाथ तक नहीं आया कुछ
बेचारे..!!
आज खुरचने बैठा हूँ
वो सुर्ख़ दीवारें
----पंकज झा
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