जन्म सौ - सौ बार हो
अश्रु नेत्रों से बहे यों, ज्यों रुधिर की धार हो
यंत्रवत बेकल हृदयतल, छूटता संसार हो
गीत मैं कैसे रचूँ ?
कैसे सृजन का बीज बोऊँ ?
शब्द - स्वर जब हैं व्यथित, तब
स्वार्थी कैसे मैं होऊँ
बाण से बींधा हुआ मैं
अंत स्वर को ताकता
सूक्ष्म जब परलोक तल पर
स्थूल क्यूं पथ जोहता
मैं निमंत्रण दे न पाया
किन्तु आना था तुम्हें
निज हृदय, संताप, पीड़ा
हर के जाना था तुम्हें
इंद्रधनुषी व्योम से
सागर ही बरसा है प्रिये !
हा! तुम्हारे बिन, तुम्हारा
प्रेम तरसा है प्रिये !
भाग्य उदय की आस में, निज उर की है ये कामना
मोक्ष पाने को, हमारा जन्म सौ - सौ बार हो
- पंकज झा
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