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नदी के उस पार

तन्हा, अनमना - सा,  निराश, हारा हुआ वो शख़्स हर शाम नदी के निर्जन किनारे पर, बेमन से  बस यूंही बैठा करता था बहते पानी में कंकड़ फेंकता था दूसरी तरफ हरियाली तो थी लेकिन कोई आता जाता नहीं था उस पार अचानक ही  एक टिमटिमाते हुए दीप पर उसकी नजर पड़ी नाउम्मीदी के मौसम में ये प्रकाश पुंज उसे हौसला दे रहा था अब सिर्फ़ शामें नहीं  हर लम्हा नदी किनारे ही गुज़र रहा था उसका दिन के उजाले में भी साफ़ देख सकता था  रोशनी उसकी हरेक कोशिका में ऑक्सीजन की तरह पहुंच रही थी उस पार पहुंच जाने की हसरत उसे बेचैन कर रही थी लेकिन वक़्त के साथ नदी भी उफ़ान मार रही थी धीरे - धीरे पानी ऊपर चढ़ रहा था वो रोशनी पानी की ओट में छिपती का रही थी और एक दिन नदी ने निगल लिया हो जैसे  अंधेरा फिर से कायम था वो शख़्स अब भी नदी किनारे बैठा करता है इस उम्मीद में कि वक्त के साथ पानी उतरेगा  इस बार वो नाउम्मीद नहीं है

गाढ़ा रंग

आज होली है वैसे मुझे कभी पसंद नहीं रहा ये त्यौहार इसका कोई दार्शनिक कारण नहीं है सिवा डर के लेकिन, आज मेरी ख्वाहिश है तुम्हारे हाथों में सना हुआ गुलाल  मेरे चेहरे से होता हुआ  मेरी रूह को सुर्ख कर दे, कुछ ऐसा रंगे, जिसकी तपिश मेरे रोओं में रंगीनियों को पैबस्त करे शायद मैं अपने डर से आज़ाद हुआ हूं हालांकि, मुझे इल्म है मैं ज़ाहिर तौर पर तुम्हें खो रहा हूं दुनिया से इंसानियत खोने के समानुपात में अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं जब हमारे शहर ने एक हवशी होली खेली थी होली की उस सुर्ख़ी ने  तमाम रंगों को स्याह किया था ज़िंदगियों को स्याह परछाईं भर बनने पर मजबूर किया आज फिर होली है, शायद असली वाली पसंद न होने के बावजूद मैं  आज उम्मीद तलाश रहा हूं  रोशन रहने की कोशिश में हूं ठीक वैसे ही,जैसे  सूरज खो देता है अपनी रोशनी का एक हिस्सा पृथ्वी जैसे पिंडों की ख़ातिर लेकिन हमेशा रोशन रहता है अपने केंद्र में हमेशा  मैं वही केंद्रबिंदु होना चाहता हूं जो शुरुआत है और इंतहा भी जहां से सभी रंगों का निकास है जहां हमारे चेहरे एक रंग हो जाएं हम सबके चेहरों से एक रंग छलके गाढ़ा रंग...

शुभचिंतकों से

मृत्यु के बाद  कोई आस नहीं रहेगी अमरता और पुनर्जन्म में मेरा यक़ीन नहीं अन्तिम वक़्त जब हो, तब   पुरानी डायरी में पड़े  सूखे गुलाब की पंखुड़ियों की गंध को  आख़िरी सांस में भर लेना चाहता हूं सुकून के साथ मेरी मौत का इश्तहार भी छपवाना शोक संदेश मेरी अन्तिम सांस का ज़िक्र भी करना  एक अख़बार उस तक भी पहुंचे। - पंकज झा

जन्म सौ - सौ बार हो

अश्रु नेत्रों से बहे यों, ज्यों रुधिर की धार हो यंत्रवत बेकल हृदयतल, छूटता संसार हो गीत मैं कैसे रचूँ ? कैसे सृजन का बीज बोऊँ ? शब्द - स्वर जब हैं व्यथित, तब स्वार्थी कैसे मैं होऊँ बाण से बींधा हुआ मैं अंत स्वर को ताकता सूक्ष्म जब परलोक तल पर स्थूल क्यूं पथ जोहता मैं निमंत्रण दे न पाया किन्तु आना था तुम्हें निज हृदय, संताप, पीड़ा हर के जाना था तुम्हें इंद्रधनुषी व्योम से  सागर ही बरसा है प्रिये ! हा! तुम्हारे बिन, तुम्हारा प्रेम तरसा है प्रिये ! भाग्य उदय की आस में, निज उर की है ये कामना मोक्ष पाने को, हमारा जन्म सौ - सौ बार हो - पंकज झा

तैयार हो जाओ मुसाफ़िर

थी निशा घनघोर, अब तैयार हो जाओ मुसाफिर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! ब्रह्म वेला में खरज की तान साधक है लगाता रात्रि के अवसाद तज वो, गीत नूतन है सुनाता मल के दृग, संताप तज तुम ज्वार हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! कोकिलों का गान सुन, कुछ प्रेरणा उर में भरो नींद त्यागो, नीड़ छोड़ो,  कर्म पथ पर पग धरो रात्रि भर तुम सुप्त हो, अब पुष्प हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! यह भी संभव है सुबह, माहौल कुछ प्रतिकूल हो प्रस्तरों से पथ भरा हो, पग के नीचे शूल हो होंगे सब निष्फल, प्रबल हुंकार हो जाओ मुसाफ़िर भोर का नव सूर्य तुमको, दे रहा है शुभ निमंत्रण! - पंकज झा

बेटा

तुम महज़ डेढ़ बरस के ही तो हो लेकिन आँखें तुम्हारी दिखाती है मुझे सारी दुनिया पढता हूँ सारा संसार, हर इक शय जो एक पल को नज़रें मिल जाएं ,तो ज़र्रा-ज़र्रा संसार का स्फटिक सा दिखता है साफ़  तुम्हारे काले-लम्बे चारों ओर तीर से फ़ैले बाल  मुझे काले नहीं, सुनहरे नज़र आते हैं जैसे तुम सूर्य हो और अपनी किरणें फ़ैला रहे हो  समूचे ब्रह्मांड में जब जब बोलते हो अपनी गडमड बोली में  "पप्पा" ऐसा लगता है जैसे किसी ने बाँचा हो महाकाव्य, हर बार, तुम्हारे शरीर की गन्ध  हज़ारों टन गुलाब के इत्र पर भारी है बेटा! मैं जानता हूँ  ऊपर की सारी बातें, सारी उपमाएं  सिर्फ़ मुझी को सच लगती है  क्योंकि मैं पिता हूँ तुम्हारा  सो स्वार्थी हूँ  तुम्हें ईश्वर तुल्य कर रहा हूँ  जो तुम हो नहीं  वैसे मैं चाहता हूँ  कि तुम्हारी आँखो में दुनिया दिक्खे मुझे ही नहीं, पूरी दुनिया को मैं चाहता हूँ- तुम वो सूर्य बनो जिसके किरणें, विनम्रता से ब्रह्मांड की सीमाएं पार कर जाएं मैं चाहता हूँ - 'आह' तक में तुम्हारी  एक महाकाव्य छिपा हो, कि तुम्हारी गन्ध हज़ारों टन गुलाब के इत्र...

हालात

सत्ता के गलियारे खुश हैं नफ़रत के हरकारे खुश हैं आग चारसू लगी हुई है ये भी खुश हैं, वो भी खुश हैं औंधा पड़ा हुआ तड़पता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको कैसा लगता है? पहरेदार अब हुए लुटेरे मूढ़मति है सबको घेरे बच्चों को अपने लतियाते काले निकले सबके चेहरे संगीनों के तले बिलखता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको  कैसा लगता है? भूख, नौकरी, किसे पड़ी है? टूट वतन की रही लड़ी है बेढंगे, बकवास, बेवजह कानूनों की लगी झड़ी है मिमियाता, बेज़ार, कलपता अपना हिंदुस्तान कैसा लगता है, तुमको कैसा लगता है? - पंकज झा