गाढ़ा रंग
आज होली है
वैसे मुझे कभी पसंद नहीं रहा ये त्यौहार
इसका कोई दार्शनिक कारण नहीं है
सिवा डर के
लेकिन, आज
मेरी ख्वाहिश है
तुम्हारे हाथों में सना हुआ गुलाल
मेरे चेहरे से होता हुआ
मेरी रूह को सुर्ख कर दे,
कुछ ऐसा रंगे, जिसकी तपिश
मेरे रोओं में रंगीनियों को पैबस्त करे
शायद मैं अपने डर से आज़ाद हुआ हूं
हालांकि, मुझे इल्म है
मैं ज़ाहिर तौर पर तुम्हें खो रहा हूं
दुनिया से इंसानियत खोने के समानुपात में
अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं
जब हमारे शहर ने एक हवशी होली खेली थी
होली की उस सुर्ख़ी ने
तमाम रंगों को स्याह किया था
ज़िंदगियों को स्याह परछाईं भर बनने पर मजबूर किया
आज फिर होली है, शायद असली वाली
पसंद न होने के बावजूद मैं
आज उम्मीद तलाश रहा हूं
रोशन रहने की कोशिश में हूं
ठीक वैसे ही,जैसे
सूरज खो देता है अपनी रोशनी का एक हिस्सा
पृथ्वी जैसे पिंडों की ख़ातिर
लेकिन हमेशा रोशन रहता है
अपने केंद्र में हमेशा
मैं वही केंद्रबिंदु होना चाहता हूं
जो शुरुआत है और इंतहा भी
जहां से सभी रंगों का निकास है
जहां हमारे चेहरे एक रंग हो जाएं
हम सबके चेहरों से एक रंग छलके
गाढ़ा रंग
प्रेम का
-पंकज झा
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