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आधी रात में

आधी रात में अचानक आती हुई पुलिसिया सायरन की आवाज़  कितनी बेसुरी है, कितना मार्मिक है सुन लिए जाने के खौफ़ में लिपटी घुटी हुई सिसकियों को सुन लेना  कितने डरावने हैं  चारों तरफ अट्टहास करते हुए चेहरे जो सिसकियों में ढूंढ़ते है आत्मिक संतोष जिनके लिए पुलिसिया सायरन शास्त्रीय संगीत है - पंकज झा

अभिलेख

उन सुर्ख़ दीवारों पर कभी नाम लिखा था मैंने तुम्हारा, टेढे़-मेढे़,आरे-तिरछे,उल्टे सीधे दर्ज़ किए थे कई प्रसंग तुमसे ही जुड़े हुए देवनागरी में नहीं लिखा था वो गुप्त लिपि मेरी थी स्वरचित एक ऐसा अभिलेख जो तुम्हारे साथ ही चिन गया दीवारों में इतिहासकारों के हाथ तक नहीं आया कुछ बेचारे..!! आज खुरचने बैठा हूँ वो सुर्ख़ दीवारें ----पंकज झा

बीस साल बाद की कविता

कैसी हो?  ठीक ही होगी ऐसा ही दावा रहता था न तुम्हारा  हमेशा! ख़ैर ! अब भी पढ़ती हो क्या ? किताबें? अब भी वैसी ही है क्या दिनचर्या तुम्हारी एक - एक सेकेंड फिक्स,  व्यस्तता कुछ कम हुई या नहीं? क्या अब भी कृष्ण केश तुम्हारे चेहरे का आवरण बनते हैं या फिर चांदनी फूटने लगी है उनसे  और तुम्हारी अधरों पर फैली वो मुस्कुराहटें ? उनका क्या? धान की बालियों - सी ही अल्हड होंगी अब तलक जीवन में खुश कैसे रहें  इसके पर्याप्त सूत्र थे तुम्हारे पास तुमने अब तक संभाल कर रखे हैं क्या ? जानती हो  इतने दिनों में , मैं बहुत कुछ बदल गया हूं बूढ़ा हो गया हूं झुर्रियां साफ दिखाई देती हैं शुष्क दरारों से इनकी  नदियां बहा करती हैं लेकिन कुछ है, जो नहीं बदला  इन बीस सालों में  यही कि मुहाने इन नदियों के आजतलक तुम्हारी ही जानिब देखते हैं ।