बेटा
तुम महज़ डेढ़ बरस के ही तो हो
लेकिन आँखें तुम्हारी दिखाती है मुझे सारी दुनिया
पढता हूँ सारा संसार, हर इक शय
जो एक पल को नज़रें मिल जाएं ,तो
ज़र्रा-ज़र्रा संसार का स्फटिक सा दिखता है साफ़
तुम्हारे काले-लम्बे चारों ओर तीर से फ़ैले बाल
मुझे काले नहीं,
सुनहरे नज़र आते हैं
जैसे तुम सूर्य हो और अपनी किरणें फ़ैला रहे हो
समूचे ब्रह्मांड में
जब जब बोलते हो अपनी गडमड बोली में
"पप्पा"
ऐसा लगता है जैसे किसी ने
बाँचा हो महाकाव्य, हर बार,
तुम्हारे शरीर की गन्ध
हज़ारों टन गुलाब के इत्र पर भारी है
बेटा! मैं जानता हूँ
ऊपर की सारी बातें, सारी उपमाएं
सिर्फ़ मुझी को सच लगती है
क्योंकि मैं पिता हूँ तुम्हारा
सो स्वार्थी हूँ
तुम्हें ईश्वर तुल्य कर रहा हूँ
जो तुम हो नहीं
वैसे
मैं चाहता हूँ
कि
तुम्हारी आँखो में दुनिया दिक्खे
मुझे ही नहीं, पूरी दुनिया को
मैं चाहता हूँ-
तुम वो सूर्य बनो जिसके किरणें, विनम्रता से
ब्रह्मांड की सीमाएं पार कर जाएं
मैं चाहता हूँ -
'आह' तक में तुम्हारी
एक महाकाव्य छिपा हो, कि
तुम्हारी गन्ध
हज़ारों टन गुलाब के इत्र पर भारी पडे
मुझे नहीं पता,
तुम ये कैसे करोगे ?
तुम महज़ डेढ बरस के ही तो हो, लेकिन
मैं जानता हूँ
तुम्हारे कन्धे मज़बूत हैं
- पंकज झा
बहुत खूब
ReplyDeleteशुक्रिया जी
Delete