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Showing posts from June, 2020

नदी के उस पार

तन्हा, अनमना - सा,  निराश, हारा हुआ वो शख़्स हर शाम नदी के निर्जन किनारे पर, बेमन से  बस यूंही बैठा करता था बहते पानी में कंकड़ फेंकता था दूसरी तरफ हरियाली तो थी लेकिन कोई आता जाता नहीं था उस पार अचानक ही  एक टिमटिमाते हुए दीप पर उसकी नजर पड़ी नाउम्मीदी के मौसम में ये प्रकाश पुंज उसे हौसला दे रहा था अब सिर्फ़ शामें नहीं  हर लम्हा नदी किनारे ही गुज़र रहा था उसका दिन के उजाले में भी साफ़ देख सकता था  रोशनी उसकी हरेक कोशिका में ऑक्सीजन की तरह पहुंच रही थी उस पार पहुंच जाने की हसरत उसे बेचैन कर रही थी लेकिन वक़्त के साथ नदी भी उफ़ान मार रही थी धीरे - धीरे पानी ऊपर चढ़ रहा था वो रोशनी पानी की ओट में छिपती का रही थी और एक दिन नदी ने निगल लिया हो जैसे  अंधेरा फिर से कायम था वो शख़्स अब भी नदी किनारे बैठा करता है इस उम्मीद में कि वक्त के साथ पानी उतरेगा  इस बार वो नाउम्मीद नहीं है

गाढ़ा रंग

आज होली है वैसे मुझे कभी पसंद नहीं रहा ये त्यौहार इसका कोई दार्शनिक कारण नहीं है सिवा डर के लेकिन, आज मेरी ख्वाहिश है तुम्हारे हाथों में सना हुआ गुलाल  मेरे चेहरे से होता हुआ  मेरी रूह को सुर्ख कर दे, कुछ ऐसा रंगे, जिसकी तपिश मेरे रोओं में रंगीनियों को पैबस्त करे शायद मैं अपने डर से आज़ाद हुआ हूं हालांकि, मुझे इल्म है मैं ज़ाहिर तौर पर तुम्हें खो रहा हूं दुनिया से इंसानियत खोने के समानुपात में अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं जब हमारे शहर ने एक हवशी होली खेली थी होली की उस सुर्ख़ी ने  तमाम रंगों को स्याह किया था ज़िंदगियों को स्याह परछाईं भर बनने पर मजबूर किया आज फिर होली है, शायद असली वाली पसंद न होने के बावजूद मैं  आज उम्मीद तलाश रहा हूं  रोशन रहने की कोशिश में हूं ठीक वैसे ही,जैसे  सूरज खो देता है अपनी रोशनी का एक हिस्सा पृथ्वी जैसे पिंडों की ख़ातिर लेकिन हमेशा रोशन रहता है अपने केंद्र में हमेशा  मैं वही केंद्रबिंदु होना चाहता हूं जो शुरुआत है और इंतहा भी जहां से सभी रंगों का निकास है जहां हमारे चेहरे एक रंग हो जाएं हम सबके चेहरों से एक रंग छलके गाढ़ा रंग...