नदी के उस पार
तन्हा, अनमना - सा, निराश, हारा हुआ वो शख़्स हर शाम नदी के निर्जन किनारे पर, बेमन से बस यूंही बैठा करता था बहते पानी में कंकड़ फेंकता था दूसरी तरफ हरियाली तो थी लेकिन कोई आता जाता नहीं था उस पार अचानक ही एक टिमटिमाते हुए दीप पर उसकी नजर पड़ी नाउम्मीदी के मौसम में ये प्रकाश पुंज उसे हौसला दे रहा था अब सिर्फ़ शामें नहीं हर लम्हा नदी किनारे ही गुज़र रहा था उसका दिन के उजाले में भी साफ़ देख सकता था रोशनी उसकी हरेक कोशिका में ऑक्सीजन की तरह पहुंच रही थी उस पार पहुंच जाने की हसरत उसे बेचैन कर रही थी लेकिन वक़्त के साथ नदी भी उफ़ान मार रही थी धीरे - धीरे पानी ऊपर चढ़ रहा था वो रोशनी पानी की ओट में छिपती का रही थी और एक दिन नदी ने निगल लिया हो जैसे अंधेरा फिर से कायम था वो शख़्स अब भी नदी किनारे बैठा करता है इस उम्मीद में कि वक्त के साथ पानी उतरेगा इस बार वो नाउम्मीद नहीं है